Thursday, 29 August 2013

 एक रुपये की कहानी
कह रहे हैं लोग बाज़ार  उठ रहा है ,
डॉलर ,पौंड  और यूरो को साथ  लेकर'
पर जाने कहा खो गया है वो मेरा एक रूपया
मुझसे रूठ कर….

कभी कीमतों से आगे हसरत हुआ करती थी,
आज हसरत से कहीं उपर कीमत पहुच चूका है,,
बाज़ार  उठ रहा है ,बाज़ार  उठ रहा है
पर मेरा वो रूपया कहीं खो गया है। ।

रुपये की खनखनाहट जो कभी देती थी ख़ुशी ,
आज चीरती चली जाती है ,
एक दर्द के साथ इन कानों में ,
मानो अब रसद ख़तम होने वाली है ,
और हम डूबने वाले हैं अंधियारे में।

मैंने एक बार बेचा था एक स्टीकर ,
अपने भाई को एक रुपये में ,
अब  भी चिपका हुआ वो ,
काठ की उस अलमारी से,
बेकार हैं वो लोग जो कहते है
रूपया टूट रहा है ,,
शायद वो मेरा एक रूपया
वहीँ कहीं पड़ा है ,
शायद वो मेरा एक रूपया
वहीँ कहीं पड़ा है ,…….